दहेज प्रथा :-

By | February 10, 2016

दहेज प्रथा :-

राजा महाराजा अपनी बेटियों से बहुत प्रेम करते थे और जो नगर सेठ धनी लोग होते थे वे भी अपनी बेटियों से प्रेम करते थे तो विवाह में ढेर सारा धन और गाडी घोडा उपहार देकर अपनी बेटियों को विदा करते थे क्योंकि वह नयी गृहस्ती बसाने जा रही है इस सोच में भय और प्रेम दोनों थे इतने लाड प्यार से पली अपनी बच्ची को दुसरे के हाथ सौपना कोई मामूली बात तो नहीं परंतु उनके मध और मोह का समाज पर ऐसा दुष्प्रभाव पड़ा की इसे फैशन बना दिया गया कोई अपने लड़के की शादी गरीब घर में नहीं करता और न ही कोई अपनी लड़की की शादी गरीब घर में करना चाहता है ।

पर इस सोच में भी दो प्रकार के लोग हैं एक सामाजिक और एक आध्यात्मिक सामाजिक मनुष्य समाज के भय में होता है चमक धमक का शौकीन और आध्यात्मिक मनुष्य सादगी और संस्कार का प्रेमी होता है जो किसी दिखावे का मोहताज नहीं ।

IS, IPS, PCS जो सरकारी विभाग के सामाजिक अधिकारी हैं इनका दहेज का रेट चार्ट उनकी पढाई की तैयारी के दौरान ही बनने लगता है करोड़ों की डील फिक्स होती है सरकारी नौकरी करने वालों की भाई बड़े अधिकारी बनने वाले हैं भले शकल पर 12 बजे हों पर रेट फिक्स है ।

और इनका तो दहेज लेने का पूरा हक भी बनता है भाई सरकारी अधिकारी हैं दहेज मुक्त भारत का अभियान जो चला रहे हैं और शुरुवात अपने ही घर से कर रहे हैं ये मांग थोड़ी रहे हैं आप दे रहे हो अपनी बेटी को बरदाश्त करने की फीस क्योंकि वो आपके घर की मुसीबत है ।

बहिष्कार करो ऐसे समाज का जो बेटियों को पराया धन समझता हो वे लक्षमी स्वरूपा हैं उनका हाथ उसी के हाथ और परिवार में देना जो लक्षमी मान कर ले जाए पराया धन नहीं की कहीं खर्च कर दे ।

मेरी भी दो बेटियाँ हैं भविष्य में मुझे भी उनका विवाह करना है पर मैं किसी को खरीदूंगा नहीं न ही कोई फीस दूंगा माता वैष्णव देवी भी कुवारीं हैं मेरी बेटियाँ भी तो उन्ही माता की अंश हैं वे भी श्री राम की प्रतीक्षा करेंगी ।

अगर अपनी माँ से प्रेम करते हो प्रेम मोह नही अगर प्रेम करते हो तो नारी का सम्मान करो क्योंकि वह भी एक दिन किसी की माँ कहलाती है और माँ तो माँ है ।

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