Dr. zakir hussain biography in hindi ज़ाकिर हुसैन (राजनीतिज्ञ) एक अनुसासन प्रिय राजनेता और एक महान व्यक्ति

By | April 27, 2020

ज़ाकिर हुसैन (राजनीतिज्ञ) एक अनुसासन प्रिय राजनेता और एक महान व्यक्ति dr zakir hussain biography in hindi

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डाक्टर ज़ाकिर हुसैन  जीवनी   ( डाक्टर ज़ाकिर हुसैन (8 फरवरी, 1848 – 3 मई, 1969) भारत के तीसरे राष्ट्रपति थे जिनका कार्यकाल 13 मई 1967 से 3 मई 1968 तक था। डा. ज़ाकिर हुसैन का जन्म 8 फ़रवरी, 1848 ई. में हैदराबाद, आंध्र प्रदेश के धनाढ्य पठान परिवार में हुआ था | कुछ समय बाद इनके पिता उत्तर प्रदेश में रहने आ गये थे।

केवल 23 वर्ष की अवस्था में वे ‘जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय’ की स्थापना दल के सदस्य बने। जाकिर हुसैन भारत के तीसरे राष्ट्रपति तथा प्रमुख शिक्षाविद थे। वे अर्थशास्त्र में पीएच. डी की डिग्री के लिए जर्मनी के बर्लिन विश्वविद्यालय गए और लौट कर जामिया के उप कुलपति के पद पर भी आसीन हुए। 1920 में उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना में योग दिया तथा इसके उपकुलपति बने। इनके नेतृत्व में जामिया मिलिया इस्लामिया का राष्ट्रवादी कार्यों तथा स्वाधीनता संग्राम की ओर झुकाव रहा।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात वे अलीगढ़ विश्वविद्यालय के उपकुलपति बने तथा उनकी अध्यक्षता में ‘विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग’ भी गठित किया गया। इसके अलावा वे भारतीय प्रेस आयोग, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, यूनेस्को, अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा सेवा तथा केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से भी जुड़े रहे। 1962 ई. में वे भारत के उपराष्ट्रपति बने।

उन्हें वर्ष 1963 मे भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 1969 में असमय देहावसान के कारण वे अपना राष्ट्रपति कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। डॉ. जाकिर हुसैन भारत में आधुनिक शिक्षा के सबसे बड़े समर्थकों में से एक थे और उन्होंने अपने नेतृत्व में जामिया मिलिया इस्लामिया के नाम से एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय के रूप में नई दिल्ली में मौजूद को स्थापित किया, जहाँ से हजारों छात्र प्रत्येक वर्ष अनेक विषयों में शिक्षा ग्रहण करते हैं. डॉ. जाकिर हुसैन ने बिहार के राज्यपाल के रूप में भी सेवा की थी और इसके बाद वे अपना राजनीतिक कैरियर समाप्त होने से पहले वे देश के उपराष्ट्रपति रहे तथा बाद में वे भारत के तीसरे राष्ट्रपति भी बने।

भारत लौटने के बाद की गतिविधियां
डॉ. जाकिर हुसैन उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी गए थे परन्तु जल्द ही वे भारत लौट आये. वापस आकर उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया को अपना शैक्षणिक और प्रशासनिक नेतृत्व प्रदान किया। विश्वविद्यालय वर्ष 1927 में बंद होने के कगार पर पहुँच था, लेकिन डॉ. जाकिर हुसैन के प्रयासों की वजह यह शैक्षिक संस्थान अपनी लोकप्रियता बरकरार रखने में कामयाब रहा था। उन्होंने लगातार अपना समर्थन देना जारी रखा, इस प्रकार उन्होंने इक्कीस वर्षों तक संस्था को अपना शैक्षिक और प्रबंधकीय नेतृत्व प्रदान किया। उनके प्रयासों की वजह से इस विश्वविद्यालय ने ब्रिटिश शासन से भारत की आजादी के लिए संघर्ष में योगदान दिया। एक शिक्षक के रूप में डॉ. जाकिर हुसैन ने महात्मा गांधी और हाकिम अजमल खान के आदर्शों को प्रचारित किया। उन्होंने वर्ष 1930 के दशक के मध्य तक देश के कई शैक्षिक सुधार आंदोलन में एक सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया।

डॉ. जाकिर हुसैन स्वतंत्र भारत में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति (पहले इसे एंग्लो-मुहम्मडन ओरिएंटल कॉलेज के नाम से जाना जाता था) चुने गए. वाइस चांसलर के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान डॉ. जाकिर हुसैन ने पाकिस्तान के रूप में एक अलग देश बनाने की मांग के समर्थन में इस संस्था के अन्दर कार्यरत कई शिक्षकों को ऐसा करने से रोकने में सक्षम हुए. डॉ. जाकिर हुसैन को वर्ष 1954 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। डॉ. जाकिर हुसैन को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में अपने कार्यकाल के अंत में राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया था। इस प्रकार वे वर्ष 1956 में भारतीय संसद के सदस्य बन गये. वे केवल एक वर्ष के लिए बिहार के राज्यपाल बनाए, पर बाद में वे पांच वर्ष (1957 से 1962) तक इस पद पर बने रहे।

जाकिर हुसैन को उनके कार्यों को देखते हुआ वर्ष 1963 में भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया. दिल्ली, कोलकाता, अलीगढ़, इलाहाबाद और काहिरा विश्वविद्यालयों ने उन्हें उन्होंने डि-लिट् (मानद) उपाधि से सम्मानित किया था. राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल के अंत के साथ ही डॉ. जाकिर हुसैन पांच वर्ष की अवधि के लिए देश के दूसरे उप-राष्ट्रपति चुने गए. उन्होंने 13 मई, 1967 को राष्ट्रपति पद ग्रहण किया। इस प्रकार वे भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति बने। वे डॉ. राजेंद्र प्रसाद और सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बाद राष्ट्रपति पद पर पहुचने वाले तीसरे राजनीतिज्ञ थे.

कार्यक्षेत्र
डॉ. ज़ाकिर हुसैन भारत के राष्ट्रपति बनने वाले पहले मुसलमान थे।  देश के युवाओं से सरकारी संस्थानों का वहिष्कार की गाँधी की अपील का हुसैन ने पालन किया। उन्होंने अलीगढ़ में मुस्लिम नेशनल यूनिवर्सिटी (बाद में दिल्ली ले जायी गई) की स्थापना में मदद की और 1926 से 1948 तक इसके कुलपति रहे।  महात्मा गाँधी के निमन्त्रण पर वह प्राथमिक शिक्षा के राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष भी बने, जिसकी स्थापना 1937 में स्कूलों के लिए गाँधीवादी पाठ्यक्रम बनाने के लिए हुई थी। 1948 में हुसैन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति बने और चार वर्ष के बाद उन्होंने राज्यसभा में प्रवेश किया। 1956-58 में वह संयुक्त राष्ट्र शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति संगठन (यूनेस्को) की कार्यकारी समिति में रहे। 1957 में उन्हें बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया गया और 1962 में वह भारत के उपराष्ट्रपति निर्वाचित हुए। 1967 में कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के रूप में वह भारत के राष्ट्रपति पद के लिए चुने गये और मृत्यु तक पदासीन रहे।

डॉ. ज़ाकिर हुसैन बेहद अनुशासनप्रिय व्यक्तित्त्व के धनी थे। उनकी अनुशासनप्रियता नीचे दिये प्रसंग से समझा जा सकता है।

यह कहानी डॉक्टर जाकिर हुसैन के जीवन की घटना हैं जो हमें ज़िन्दगी की बहुत बड़ी सीख देती हैं |बात उन दिनों की हैं जब पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर जाकिर हुसैन जामिया मिलिया इस्मालिया के कुलपति थे | हुसैन साहब की आरज़ू थी कि उनके विद्यार्थी जीवन के हर क्षेत्र में अव्वल रहे | उन्हें देखकर उनके ज्ञान की झलक दिखे उनमे तौर तरीके और सलीके हो जो सभी के लिए गर्व की बात हो जिसके लिए उन्होंने कुछ नियम बनाये उन्होंने एक आदेश जारि किया जिसमे लिखा गया कि अब से सभी विद्यार्थी साफ़ कपड़े एवम पॉलिश किये हुए जूते पहनकर आये |

आदेष जारि किये 7 दिन हो गये थे | एक दिन डॉ. हुसैन मुआयना करने निकले पर उन्हें कोई तब्दिली नज़र नहीं आई | इसका कारण पूछने पर पता चला विद्यार्थियों को कोई रूचि नहीं हैं | डॉ. हुसैन यह सुन अपने कमरे में चले गए |

दुसरे दिन, डॉ. हुसैन खुद विद्यालय के दरवाजे पर बूट पॉलिश लेकर बैठे और उन्होंने सबको पॉलिश करवाकर अन्दर जाने कहा | यह देख कर विद्यार्थियों को शर्म महसूस हुई और उन्हें अपनी करनी पर खेद हुआ दुसरे दिन से सभी विद्यार्थी साफ सुथरे कपड़े और पॉलिश किये जूते पहनकर आने लगे |

इस घटना के बाद डॉ. हुसैन से सवाल किया गया कि उन्होंने स्वयं यह काम क्यूँ किया? जिसका जवाब यह था कि अगर कुछ अच्छा करना है तो संस्था के प्रमुख को ही विद्यार्थियों का उत्साह बढ़ाना होगा | जब प्रमुख स्वयं इसका उदहारण पैश करते हैं तो असर जल्दी और पुरे प्रतिशत के साथ होता हैं |

देश अथवा घर के प्रमुख जब स्वयं अनुशासन में होंगे तब ही अपने से छोटे को सिखा पाएंगे | खुद में जो अनुशासन ना हो उसकी अपेक्षा दूसरों से करना गलत हैं और अगर कुछ बदलाव चाहते हैं तो हमे खुद उसका हिस्सा बनाना जरुरी हैं |

आज के समय से अगर इस घटना कि तुलना करें तो देश में सफाई अभियान शुरू किया गया हैं जिसमे स्वयं मोदी जी ने भी अपना सहयोग दिया हैं और साथ ही बड़े- बड़े दिग्गजों ने इस कार्य में अपना सहयोग देकर जनता से अपील की हैं कि अपने देश को स्वच्छ बनाये |

कहानियाँ जीवन में बहुत मायने रखती हैं | कई बार बड़ी से बड़ी डिग्री भी ज्ञान नहीं देती और एक छोटी सी कहानी जीवन बदल देती हैं | शिक्षाप्रद कहानी को आधार बनाकर अपने बच्चो को जीवन का सच्चा ज्ञान दे |

 

 

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